पत्थर दिल को भी रुला दे, कहानी उस गीत के बनने की
Bushra khan noori...
लता मंगेशकर इस गाने को लेकर लगातार अपनी असमर्थता जता रही थीं। वक्त नहीं है, रिहर्सल नहीं की है, गा नहीं पाऊंगी वगैरह वगैरह...। मगर कवि रामचंद्र नारायणजी द्वेदी थे कि मानने को तैयार न थे। उनका कहना था कि देखना यह गाना इतना मशहूर होगा कि बच्चे-बच्चे की जुबां पर चढ़ जाएगा। तुम्हें जरूर गाना चाहिए।
| kavi Pradeep |
आखिर लता को इस गाने का प्रस्ताव स्वीकार करना ही पड़ा। कवि रामचंद्र कोई और नहीं कवि प्रदीप का ही मूल नाम हैै। उनकी जुबां से निकली वह बात पत्थर की लकीर हो जाएगी यह न तो लता को मालूम था और न खुद उन्हें।
गाना खत्म हो जाने के बाद मेहबूब खान लता को बैक स्टेज से बुलाने आए थे-चलो तुम्हें पंडित जी ने बुलाया है। पंडित जी यानी जवाहरलाल नेहरू ने खड़े होकर लता का अभिवादन किया था। बोले-तुमने मुझे रुला दिया बेटी। कवि प्रदीप से भी नेहरू की भेंट हुई। तब नेहरू को इस बात का पता लगा कि वे जेल में जिन राष्ट्र प्रेम के गीतों को गया करते थे वे प्रदीप के ही रचे हुए हैं ।
अभी-अभी चीन और भारत के बीच होने वाली जंग खत्म ही हुई थी। अपने वीर जवानों की शहादत से पूरा देश सदमे में था। उस वक्त के राजनितिक मोर्चे की तरफ से फिल्म जगत की तरफ एक ऐसा गीत बनाने की उम्मीद से देखा जा रहा था जो जवानों और जनता में फिर से जोश और जज्बा भर दे। देशप्रेम पर लिखने के लिए कवि प्रदीप मशहूर थे। यह जिम्मा भी उन्ही को ही मिला। गाने को संगीत से सजाया था संगीतकार सी. रामचंद्रन ने।
| lata Mangeshkar |
गीत तैयार हो चुका था। उस अवसर का इंतजार था जब यह प्रस्तुत किया जाना था। 26 जनवरी 1963 गणतंत्र दिवस आ पहुंचा। दिल्ली का रामलीला मैदान लोगों से खचाखच भरा था। तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। फिल्म जगत के भी कई दिग्गजों को बुलाया गया था। दिलीप कुमार, मेहबूब खान, राजकपूर, मदनमोहन, शकंर जयकिशन पहुंचे थे।
लता मंच पर आईं। अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम... सहित कई देशभक्ति गीत गाए। बारी आई कवि प्रदीप के रचे इस गाने की। ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी...। जैसे-जैसे गाना आगे बढ़ता है लोग देशप्रेम की भावना से सराबोर हो उठते हैं। आंखों से आंसू बह चलते हैं। जिस मकसद से रचा था उसमें यह एक सौ एक फीसदी कामयाब रहा था। 57 सालों बाद आज भी यह देशप्रेम के गीतों का सिरमौर है। स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस रोम-रोम में देश पर मर मिटने की लौ जला देता है।
सी. रामचंद्रन और कवि प्रदीप की यह गैर फ़िल्मी रचना लता के कॅरियर का एक कोहिनूर कहलाएगा। उनका कोई भी म्यूजिक कॉन्सर्ट इस गाने के बिना पूरा ही नहीं होता।युवा पीढ़ी इस 15 अगस्त पर इस गीत को सुने तो फोकस लाइट से बाहर रहे कवि प्रदीप और सी. रामचंद्रन के नाम भी याद रखे ।