... तब जाकर बनती है एक मुग़ल-ए-आज़म
-Bushra Khan Noori ...
छह दशक पहले इतिहास परदे पर ऐसा उतरा कि खुद इतिहास बन गया। भारतीय सिनेमा का यह ऐतिहासिक कोहिनूर 'मुगले आजम' 5 अगस्त 2020 को साठ बरस की होने को जा रही है। निर्देशक के. आसिफ के अलावा सैकड़ों लोगों की मेहनत और सब्र फिल्म के जर्रे-जर्रे में पिरा हुआ है।
 |
➤ मेरा दिल भी कोई आपका हिंदुस्तान नहीं, जिस पर आप हुकूमत करें।
|
आज सिर्फ बात उन की जिनकी कलम से निकला एक-एक डायलॉग लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर नक्श हो गया। शुरू से आखिर तक ऐसे-ऐसे संवाद हैं जो अमर हो गए। इन्हें लिखने वाले थे अमानउल्लहा खान, कमाल अमरोही, एहसान रिजवी और वजाहत मिर्जा।
कुछ यादगार संवाद:
➤ इंसाफ हमें बेटे से ज्यादा अजीज है- शहंशाह अकबर।
➤ हमारा हिंदुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं कि एक लौंडी जिसकी मलिका बने-महारानी जोधा।
➤ बेहिसाब बख्शिशों के लिए यह कनीज शहंशाह जलालुद्दीन बादशाह अकबर को अपना खून माफ करती है- अनारकली।
 |
➤ संसार में शायद तू पहली तलवार है जिसे मां सीने से लगाया है
|
➤ वो जानते हैं कि इस वक्त मेरे दिल को मरहम की जरूरत थी फिर भी उन्होंने मेरे लिए नशतर भेजा- शहजादा सलीम।
➤ राजपूत जान हारता है,वचन नहीं- दुर्जन सिंह।
➤ तुम अपनी मौहब्बत की आग में मुगलों के ताज पिघलाकर एक रक्कासा के पैरों की पाजेब बनाना चाहते हो-अकबर।
➤ बाखूदा हम मौहब्बत के दुशमन नहीं, अपने उसूलों के गुलाम हैं-अबकर।
➤ यह है मैदाने जंग लाखों बेगुनाह इंसानों का खून और एक इंसान की फतेह-संगतराश।
➤ सुहाग की लाली मेरे माथे से मिटा तो दी लेकिन अब आपको सलीम से खून से ये लाली लागनी होगी।
 |
➤ अगर ऐसा नहीं हुआ तो सलीम तुझे मरने नहीं देगा
और हम अनारकली तुझे जीने नहीं देंगे
|
➤ सुहाग की कीमत अगर औलाद का खून है तो लीजिए ये तलवार और बड़ी खुशी से मेरे बच्चे को कत्ल कर दीजिए। मैं उफ तक न करुंगी- जोधा।
➤ इन हाथों से अकबरे आजम की तलवार क्या उठेगी जो अपने सुहाग की चूडिय़ों का बोझ तक नहीं उठा सकतीं- अकबर।
➤ जब्त मैं करूं जिसकी दुनियॉ विरान कर दी गई हो और जब्त वो न करें जिन के सिर्फ शोक-ए- बादशाहत को ठेंस लगी। यह तुम्हारे महाबली की बादशाहत नहीं खुदाई है -सलीम।
➤ खुद्दार मुगलों की आबरू इतनी हल्की नहीं कि एक नाचीज लौंडी के बराबर तुल जाए-जोधा।
➤ आपनी औलाद को अपना बनाने के लिए हमें एक कनीज का एहसास उठाना होगा-अकबर ।
➤ शहंशाह बाप का भेष बदलकर आया है-सलीम।
 |
➤ शहंशाहों के इंसाफ और जुल्म में
किस कद्र कम फर्क होता है
|
➤ हमारी दुआ है कि मैदाने जंग में खुदा तुम्हें जलाल-ए-अकबरी से महफूज रखे- अकबर।
➤ तुम हिंदुस्तान के मुक़द्दस तख्त पर एक हसीन लौंडी को नचाना चाहते हो-अकबर।
➤ मान सिंह! लो हम आज मुगलों का मुस्तकबिल तुम्हारे हवाले करते हैं- अकबर।
➤ अगर खय्याम की रुबाई सुनहरे वर्क की बजाए पथरीली जमीन पर लिख दी जाए तो क्या उसके मायने बदल जाएंगे- सलीम।
...