Saturday, 15 August 2020

Dil Diya Hai Jaan Bhi Denge Aye Watan Tere Liye...

 

हम जिएंगे और मरेंगे ए वतन तेरे लिए...

Bushra

चौतीस साल पहले ऐसे ही अगस्त के महीने का एक दिन था। गीतकार आनंद बख्शी के घर कई लोग बैठे थे। निर्माता-निर्देशक सुभाष घई आनंद को गाने की सिचुएशन बता चुके थे। गाने की चंद लाइनें लिख कर आंनद ने उन्हें सुनाईं। सुनकर सुभाष एकदम भावुक हो गए। उन्होंने खुश होकर जेब से सौ रुपए का नोट निकाला। 

उस पर उस दिन की तरीख और अपना नाम दर्ज किया और आनंद के हाथ में थमा दिया। सुभाष घई दिलीप कुमार, नूतननसीरुद्दीन शाह, श्रीदेवी, अनुपम खेर, अनिल कपूर, जैकी श्राफ आदि को लेकर एक फिल्म बना रहे थे 'कर्मा'। 

फिल्म बनकर तैयार हुई। 8 अगस्त 1986 को सिनेमाघरों में कर्मा के रिलीज होने के बाद तो मानो लोग देशप्रेम की बौछारों से सराबारे हो गए ।

आनंद बख्शी का रचा वह गीत 'हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए, दिल दिया है जां भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए...' आज 36 साल बाद भी हम सब  सुन रहे हैं। मानो यह गीत अमर हो गया हो ।  कर्मा सुपरहिट थी, उतने ही लोकप्रिय थे फिल्म के गीत। इन गीतों को संगीत दिया था संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने। आनंद बख्शी के दुनियॉ के चले जाने के बाद उनके बेटे को वह नोट पिता के बटुए के एक कोने में दुबका मिला। जिस पर तरीख लिखी थी 3 अगस्त 1984 और साथ में एक नाम लिखा था सुभाष घई। 

   

Wednesday, 12 August 2020

The man who give us unforgettable 'SHAHEED'

भुला दिए गए शहीद फिल्म बनाने वाले केवल कश्यप


Bushra Khan noori...

केवल  पी. कश्यप और मनोज कुमार की मुलाकात अक्सर अखबार के दफ्तर में होती रहती थी। केशव फिल्म इंडस्ट्री में पीआर का काम करते थे।  म्यूजिक कंपोजर शंकर जयकिशन, ओपी नय्यर आदि का प्रचार का काम देखा करते थे। काम अच्छा चल रहा था मगर शायद अंदर कोई बेचैनी थी। 

एक दिन वे मनोज से बोले कि मैं पब्लिसिटी के काम से थक चुका हूं,  एक फिल्म बनाना चाहता हूं। फिल्म शहीद भगत सिंह पर बनाना चाहता हूं। मनोज ने उन्हें किसी लीडिंग स्टार को फिल्म में लेने की सलाह दी। मगर केशव ने मनोज से ही इस फिल्म का जिम्मा लेने की बात कही। मनोज कुमार देशभक्ति पर फिल्मे बनाने के लिए मशहूर थे। मनोज कुमार ने उन्हें समझते हुए कहा कि इस पर पहले ही 2 फिल्में बन चुकी हैं। वे कोई खास नहीं चल पाई। मगर केशव थे कि अपने इरादे पर अडिग थे।  फिर क्या था मनोज को राज़ी होना पड़ा। यहां से शुरू हुई कहानी शहीद के बनने की।
 फिल्म  के लिए पैसा इकठ्ठा करने में बहुत मुश्किलें पेश आई  इन बातों का जिक्र मनोज कुमार अखबारों को दिए अपने इंटरव्यूज में कर चुके हैं। फिल्म में मनोज कुमार भगत सिंह के किरदार में थे। सुखदेव बने थे प्रेम चोपड़ा और  शिवराम राजगुरु का रोल अनंत कुमार मराठे  ने निभाया था 
 सन 1965 में शहीद प्रदर्शित हुई।  एस. राम शर्मा ने इस फिल्म का निर्देशन किया था। फिल्म सुपरहिट रही। 
फिल्म के बेजोड़ गाने नई पुरानी पीढ़ी के दिलों पर राज करते हैं।
-सरफरोशी की तमन्ना ... मेरा रंग दे बसंती चोला...
-पगड़ी संभाल जट्टा ... ए वतन ऐ वतन सरीखे गानों ने धूम मचा दी थी...

फिल्म बनने के 50 साल बाद केशव कश्यप की नाराज़गी भी लोगों के सामने आई। मनोज कुमार ने शहीद के 50 साल पूरे होने पर फिल्म की स्क्रीनिंग का कार्यक्रम रखा था। इसमें केशव ने आने से इंकार कर दिया।  उनके मना करने पर मनोज कुमार ने यह प्रोग्राम ही कैंसल कर दिया।
 केशव को शिकायत थी कि उन्हें इस के बारे में सिर्फ एक दिन पहले ही बताया गया था।
 साथ ही उनके मन में छुपी कोई कसक भी मानो उबल पड़ी थी। उन्हें लगता है कि फिल्म का सारा क्रेडिट मनोज कुमार ले गए। मनोज का कहना था कि वे अपने हर इंटरव्यू में फिल्म के प्रोड्यूसर का जिक्र जरूर करते हैं। खैर, अपने दिल की शिकायतें लेकर भगत सिंह बनाने वाले केशव दुनिया को अलविदा कह गए। 
रुपहले पर्दे पर दुनिया जिसे  देखती है वहीं चेहरा याद रहता है। पर्दे के पीछे के लोगों का योगदान बंद दरवाजे के पीछे ही रहता है। 

Sunday, 9 August 2020

Kavi Pradeep's song- Aye Mere Watan Ke Logon...



पत्थर दिल को भी रुला दे, कहानी उस गीत के बनने की 

Bushra khan noori...

लता मंगेशकर इस गाने को लेकर लगातार अपनी असमर्थता जता रही थीं। वक्त नहीं है, रिहर्सल नहीं की है, गा नहीं पाऊंगी वगैरह वगैरह...।  मगर कवि रामचंद्र नारायणजी द्वेदी थे कि मानने को तैयार न थे। उनका कहना था कि देखना यह गाना इतना मशहूर होगा कि बच्चे-बच्चे की जुबां पर चढ़ जाएगा। तुम्हें जरूर गाना चाहिए।

kavi Pradeep 
 आखिर लता को इस गाने का प्रस्ताव स्वीकार करना ही पड़ा। कवि रामचंद्र कोई और नहीं कवि प्रदीप का ही मूल नाम हैै। उनकी जुबां से निकली वह बात पत्थर की लकीर हो जाएगी यह न तो लता को मालूम था और न खुद उन्हें।
गाना खत्म हो जाने के बाद मेहबूब खान लता को बैक स्टेज से बुलाने आए थे-चलो तुम्हें पंडित जी ने बुलाया है। पंडित जी यानी जवाहरलाल नेहरू ने खड़े होकर लता का अभिवादन किया था। बोले-तुमने मुझे रुला दिया बेटी। कवि प्रदीप से भी नेहरू की भेंट हुई।  तब नेहरू को इस बात का पता लगा कि वे जेल में जिन राष्ट्र प्रेम के गीतों को गया करते थे वे प्रदीप के ही रचे हुए हैं । 
अभी-अभी चीन और भारत के बीच होने वाली जंग खत्म ही हुई थी। अपने वीर जवानों की शहादत से पूरा देश सदमे में था। उस वक्त के राजनितिक मोर्चे की तरफ से फिल्म जगत  की तरफ एक ऐसा गीत बनाने की उम्मीद से देखा जा रहा था जो जवानों और जनता में फिर से जोश और जज्बा भर दे। देशप्रेम पर लिखने के लिए कवि प्रदीप  मशहूर थे। यह जिम्मा भी उन्ही को ही मिला। गाने को संगीत से सजाया था संगीतकार सी. रामचंद्रन ने।
lata Mangeshkar
गीत तैयार हो चुका था।  उस अवसर का इंतजार था जब यह प्रस्तुत किया जाना था। 26 जनवरी 1963 गणतंत्र दिवस आ पहुंचा। दिल्ली का रामलीला मैदान लोगों से खचाखच भरा था। तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। फिल्म जगत के भी कई दिग्गजों को बुलाया गया था। दिलीप कुमार, मेहबूब खान, राजकपूर, मदनमोहन, शकंर जयकिशन पहुंचे थे। 
लता मंच पर आईं। अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम... सहित कई देशभक्ति गीत गाए।  बारी आई कवि प्रदीप के रचे इस गाने की। ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी...। जैसे-जैसे गाना आगे बढ़ता है लोग देशप्रेम की भावना से सराबोर हो उठते हैं। आंखों से आंसू बह चलते हैं।  जिस मकसद से रचा था उसमें यह एक सौ एक फीसदी कामयाब रहा था।  57 सालों बाद आज भी यह देशप्रेम के गीतों का सिरमौर  है। स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस रोम-रोम में देश पर मर मिटने की लौ जला देता है।
सी. रामचंद्रन और कवि प्रदीप  की यह गैर फ़िल्मी रचना लता के कॅरियर का एक कोहिनूर कहलाएगा। उनका कोई भी म्यूजिक कॉन्सर्ट इस गाने के बिना पूरा ही नहीं होता।युवा पीढ़ी इस 15 अगस्त पर इस गीत को सुने तो फोकस लाइट से बाहर रहे कवि प्रदीप और सी. रामचंद्रन के नाम भी याद रखे ।  

Wednesday, 5 August 2020

The Magnum Opus Of Hindi Cinema


  05 अगस्त 1960 को प्रदर्शित हुई थी हिंदी सिनेमा की यह उत्कृष्ट कृति  


Bushra khan noori... 

'मैं हिदुस्तान हूं । हिमायला मेरी सरहदों का निगहबान है। गंगा मेरी पवित्रता की सौगंध। तारीख की इब्तिदा से मैं अंधेरों और उजालों का साथी हूं। और मेरी खाक पर संगेमरमर में लिपटी हुई ये इमारतें दुनिया से कह रही हैं जालिमों ने मुझे लूटा और मेहबानों ने मुझे संवारा। नादानों ने मुझे जंजीरें पहना दीं। और मेरे चाहने वालों ने उन्हें काट फेंका। मेरे इन चाहने वालों में एक इंसान का नाम जलालुददीन मोहम्मद अकबर था। अकबर ने मुझसे प्यार किया। मजहब और रस्मों रिवायत की दीवार से बलंद होकर इंसान को इंसान से मौहब्बत करना सिखाया। और हमेशा के लिए मुझे सीने से लगा लिया...' हिंदुस्तान की जुबां से निकली इन चंद  बातों के  साथ शुरू होती है फिल्म मुगले आजम। 


अपने बनने के 44  साल बाद साल 2004  में जब मुगले आजम को कलर किया गया तो एक बार फिर यह थियेटर में प्रदर्शित हुई । यह पहली ऐसी फिल्म थी जिसे रंगीन करने के बाद दोबारा प्रदर्शित किया गया था। जिसे देखने के लिए उस दौर की उम्र वाले ही नहीं जवान पीढ़ी भी कम जोश में नहीं थी।

 जब पत्रकार राजकुमार केसवानी इस फिल्म की गहराइयों में उतरते हैं तो इसके बनने  के 60 साल बाद निकाल लाते हैं 'दास्तान-ए- मुगले आजम' की शक्ल में एक बेशकीमती किताब। 

photo credit: keswani ji ka facebook account


जिसकी शुरूआत कुछ यों होती है-
 '1922 में एक साथ दो घटनाएं हुईं जिनका जाहिरा तौर पर एक-दूसरे से कोई ताल्लुक नजर नहीं आता था। एक तरफ लाहौर में बैठे एक ड्रामानिगार  इम्तियाज अली 'ताज' ने एक नाटक लिखा 'अनारकली' तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 14  जून 1922 को डॉक्टर फजल करीम और बीबी गुलाम फातिमा के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया करीमुददीन आसिफ। पूरे 22 साल बाद जाकर इन दो घटनाओं के बीच का रिश्ता उस वक्त उजागर हुआ जब करीमुददीन आसिफ जो उस वक्त तक बम्बई पहुंचकर के. आसिफ बन चुका था, ने अनाकरली की कहानी सुनी और उसे अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया।'  इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए जिसमे कई गुमनाम किस्से बयां हुए हैं । 

Whose invaluable contribution was behind the scenes

 निर्देशक आसिफ और न जाने कितने लोगों की मेहनत के सिर पर इसकी  कामयाबी का ताज।

स्क्रीन प्ले- के. आसिफ और अमानउल्लाह खान, डायलॉग्स-अमानउल्लाहखान, कमाल अमरोही, एहसान रिजवी, वजाहत मिर्जा। संगीत- नौशाद, सिनेमैटोग्राफी- आर डी माधुर, फिल्म एडिटिंग- धर्मवीर, आर्ट डायरेेक्शन-एम के सैय्यद, अब्दुल हमिद- मेकअप आर्टिस्ट, पी जी जोशी- मेकअप आर्टिस्ट आर पितांबरअसिसटेंट मेकअप आर्टिस्ट, टी राजाराम- असिसटेंट मेकअप आर्टिस्ट, मदन चोपड़ा ... असिसटेंट प्रोड्क्शन मैनेजर, एसवी कोरेगांवकर ... असिसटेंट प्रोड्क्शन मैनेजर, सुल्तान मोहम्मद ... असिसटेंट प्रोड्क्शन मैनेजर, असलम नूरी ... प्रोडक्शन मैनेजर, लक्ष्मण सिंह ...असिसटेंट प्रोडक्शन मैनेजर, सेकैंड यूनिट डायरेटर या असिसटेंट डायरेक्टर, राशिद अब्बासी ... सहायक निर्देशक, खालिद अख्तर ... मुख्य सहायक निदेशक, एमडी अनवर ... सहायक निदेशक, रफीक अरबी ... सहायक निर्देशक, सुरिंदर कपूर ... सहायक निर्देशक, के मनोहर ... सहायक निर्देशक, एच ए रियाज ... सहायक निर्देशक,

 एसटी जैदी ... एसोसिएट डायरेक्टर, सैयद इमाम ...असिसटेंट सेटिंग्स, बी.आर. खेडकर ... चीफ मोल्डर, शैक लाल ... असिसटेंट सेटिंग्स, एलडी लिंगायत ... पेंटर असिसटेंट , एच जे महात्रे ...पेंटर असिसटेंट , एडम मिस्त्री ... असिसटेंट सेटिंग्स (स्वर्गीय एडम मिस्त्री के रूप में), आगा जानी शिराज़ी ... कांच की कलाकृति, शीश महल , एस.पी. वर्लीकर ... मुख्य चित्रकार, शेख अकरम ...

 डायरेक्टर ऑफ साउंड, रंजीत बिसवास ... साउंड असिसटेंट, .जी. मेहता ... साउंड असिस्टेंट, हसन राजे ...साउंड असिस्टेंट, बद्री नाथ शर्मा ... साउंड मिक्सर, शल इफेक्ट्स-अंसारी ... मुख्य शीर्षक, एस. अजीम ... फाइटिंग इंस्ट्रक्टर, तलवार , मास्टर रोशन ... फाइटिंग इंस्ट्रक्टर, तलवार , कैमरा और इलेक्ट्रिकल डिपार्टमेंट, एमडी अयूब ... अतिरिक्त कैमरा ऑपरेटर, लड़ाई के दृश्य / सहायक कैमरा, चंदू ... स्टिल फोटोग्राफर, के. गोपालराव ... सहायक कैमरा / मुख्य इलेक्ट्रीशियन, केरवद्ग ... अतिरिक्त कैमरा ऑपरेटर, लड़ाई के दृश्य, शफ़ान मिर्ज़ा ... अतिरिक्त कैमरा ऑपरेटर, युद्ध के दृश्य / सहायक कैमरा, एम.के. मुकददम ... अतिरिक्त कैमरा ऑपरेटर, युद्ध के दृश्य, ए. एल सैयद ... आउटडोर स्टिल फोटोग्राफर, एम.के. सैयद ... आउटडोर स्टिल फोटोग्राफर, जग्गी ... वेशभूषा, कॉस्टयूम, हबीब मिर्जा ... कढ़ाई, एमब्रायडरी , बीएन त्रिवेदी ... वॉर्डरोब इंचार्ज, एडिटोरियल डिपार्टमेंट, सत्ते सिंह रावत ... असिसटेंट एडिटर यानी सहायक संपादक, एमडी शाहिद ... सहायक संपादक, प्रभाकर सुपारे ... सहायक संपादक (पी। जी। सुपारे के रूप में), गुलाम अली खान ... पार्श्व गायक, शकील बदायुनी ... गीतकार, शमशाद बेगम ... पार्श्व गायक , रॉबिन चटर्जी ... गीत रिकार्डर , मोहम्मद इब्राहिम ... संगीत सहायक , कौशिक ... सॉंग रिकॉडिस्ट, लता मंगेशकर ... पार्श्व गायक, मोहम्मद रफी ... पार्श्व गायक,मोहम्मद शफी ... म्यूजिक असिसटेंट,नूरजहां ... प्लेबैक सिंगर,रमा देवी ... नृत्य सहायक, लक्ष्मी ... नृत्य सहायक,लच्छू महाराज ... नृत्य निर्देशक, हाजी शम्सुद्दीन ... जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर , धन्यवाद-सेठ बद्रीप्रसाद दूबे ... आभार- देविका रानी ... आभार-अभिमन्यु सिंह ...  फिल्म शामिल हाथी-घोड़ों का भी मेरी तरफ से आभार . 

Tuesday, 4 August 2020

Naushad and Shakeel Badauni's pen continued all night


भोर के छह बजे जाकर कलमबद्ध हुआ था- प्यार किया तो डरना क्या... 

Bushra khan noori ... 

इधर के. आसिफ इसी कहानी पर फिल्म मुगल-ए-आजम बनाने की तैयारी कर रहे थे और उधर फिल्मिस्तान के बैनर तले अनारकली बनकर तैयार होने वाली थी। संगीतकार नौशाद अली जिन्हें  मुगले आजम के संगीत का जिम्मा मिला था। 
उन्होंने आसिफ से कहा था कि फिल्मिस्तान वाले आपसे जल्दी बना लेंगे। मुगले आजम और अनारकली एक ही कहानी है। आप सबजेक्ट बदल दीजिए। खामोख्वाह कंपीटीशन होगा। सब्जेक्ट तो बदलूंगा नहीं और आपको काम भी करना है। अपनी जिद के पक्के आसिफ ने दो टुक कह दिया था। नौशाद इसके बाद फिर कुछ न कह सके।

Naushad and Shakeel Badauni

अनारकली बनकर पहले रिलीज भी हो गई। फिल्म का गाना-  मौहब्बत में ऐस कदम डगमगाए, जमाना ये समझा कि हम पी के आए...सुपर हिट हो गया था।
नौशाद फिर बोले कि अकबर बैठा है, सलीम भी बैठा है, अनारकली आएगी और गाना होगा।
 आसिफ आपकी और अनाकरली की सिचुएशन एक ही जैसी है। या तो आप सिचुएशन बदलिए या गाने का आइडिया। मगर आसिफ का जवाब फिर वही था, सिचुएशन भी वही रहेगी और गाना भी वही होगा। इम्तिहान आपका है मेरा नहीं।
 मैं सेट ऐसा लगा रहा हूं जो आज तक लोगों ने देखा नहीं होगा।  वाकई उन्होंने देश और विदेशा न जाने कहां-कहां से टेक्निशियन बुलाकर लाजवाब शीश महल बनवाकर तैयार कर लिया था।
अब इम्तिाहन नौशाद और शकील बदायूंनी का बाकी था।  शकील फिल्म के गाने लिख रहे थे।  इस इम्तिहान में कामयाब होने के लिए एक दिन नौशाद और शकील शाम को छह बजे कमरा बंद करके बैठे, लिखते रहे, लिखते रहे। न जाने कितने मुखड़े लिख डाले। कितने बनाए, बिगाड़ दिए। फिर आखिर में गाना बनकर तैयार हुआ। प्यार किया तो डरना क्या...। दोनों ठंडी सास लेकर कमरे से बाहर निकले तो सुबह के छह बज रहे थे। सारी रात गुजर गई थी।
Pyar Kiya Toh Darna Kya...Pyaar Kiya Koi Chori Nahi Ki...
संगीतकार नौशाद ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि उस वक्त के गानों की उम्रों में वह रात भी शामिल होती होगी जो मैंने और शकील ने उस गाने को लिखने में गुजार दी थी।
 ये अपने-अपने क्षेत्रों के वे दिग्गज लोग थे जो हिंदी फिल्म जगत के रचे जा रहे इतिहास में कैमरे के पीछे रहकर खामोशी के साथ अपना काम कर रहे थे। या यों कहें खुद इतिहास बना रहे थे।

Sunday, 2 August 2020

Mughal-e-Azam is completing 60 years


... तब जाकर बनती है एक मुग़ल-ए-आज़म  

-Bushra Khan Noori ...


छह दशक पहले इतिहास परदे पर ऐसा उतरा कि खुद इतिहास बन गया। भारतीय सिनेमा का यह ऐतिहासिक कोहिनूर  'मुगले आजम' 5 अगस्त 2020 को साठ बरस की होने को जा रही है। निर्देशक के. आसिफ के अलावा सैकड़ों लोगों की मेहनत और सब्र फिल्म के जर्रे-जर्रे में पिरा हुआ है।

➤  मेरा दिल भी कोई आपका हिंदुस्तान नहीं, जिस पर आप हुकूमत करें।


आज सिर्फ बात उन की जिनकी कलम से निकला एक-एक डायलॉग लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर नक्श हो गया। शुरू से आखिर तक ऐसे-ऐसे संवाद हैं जो अमर हो गए। इन्हें लिखने वाले थे अमानउल्लहा खान, कमाल अमरोही,  एहसान रिजवी और वजाहत मिर्जा।
 कुछ यादगार संवाद:

➤ इंसाफ हमें बेटे से ज्यादा अजीज है- शहंशाह अकबर।

➤  हमारा हिंदुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं कि एक लौंडी जिसकी मलिका बने-महारानी जोधा।

➤  बेहिसाब बख्शिशों के लिए यह कनीज शहंशाह जलालुद्दीन बादशाह अकबर को अपना खून माफ करती है- अनारकली।

➤ संसार में शायद तू पहली तलवार है जिसे मां सीने से लगाया है


➤  वो जानते हैं कि इस वक्त मेरे दिल को मरहम की जरूरत थी फिर भी उन्होंने मेरे लिए नशतर भेजा- शहजादा सलीम।

➤  राजपूत जान हारता है,वचन नहीं- दुर्जन सिंह।

➤  तुम अपनी मौहब्बत की आग में मुगलों के ताज पिघलाकर एक रक्कासा के पैरों की पाजेब बनाना चाहते हो-अकबर।

➤  बाखूदा हम मौहब्बत के दुशमन नहीं, अपने उसूलों के गुलाम हैं-अबकर।

➤  यह है मैदाने जंग लाखों बेगुनाह इंसानों का खून और एक इंसान की फतेह-संगतराश।

➤   सुहाग की लाली मेरे माथे से मिटा तो दी लेकिन अब आपको सलीम से खून से ये लाली लागनी होगी।

➤ अगर ऐसा नहीं हुआ तो सलीम तुझे मरने नहीं देगा

 और हम अनारकली तुझे जीने नहीं देंगे


➤  सुहाग की कीमत अगर औलाद का खून है तो लीजिए ये तलवार और बड़ी खुशी से मेरे बच्चे को कत्ल कर दीजिए। मैं उफ तक न करुंगी- जोधा।

➤  इन हाथों से अकबरे आजम की तलवार क्या उठेगी जो अपने सुहाग की चूडिय़ों का बोझ तक नहीं उठा सकतीं- अकबर।

➤  जब्त मैं करूं जिसकी दुनियॉ विरान कर दी गई हो और जब्त वो न करें जिन के सिर्फ शोक-ए- बादशाहत को ठेंस लगी। यह तुम्हारे महाबली की बादशाहत नहीं खुदाई है -सलीम।

➤  खुद्दार मुगलों की आबरू इतनी हल्की नहीं कि एक नाचीज लौंडी के बराबर तुल जाए-जोधा।

➤  आपनी औलाद को अपना बनाने के लिए हमें एक कनीज का एहसास उठाना होगा-अकबर ।

➤  शहंशाह बाप का भेष बदलकर आया है-सलीम।

➤  शहंशाहों के इंसाफ और जुल्म में 

किस कद्र कम फर्क होता है


➤  हमारी दुआ है कि मैदाने जंग में खुदा तुम्हें जलाल-ए-अकबरी से महफूज रखे- अकबर।

➤  तुम हिंदुस्तान के मुक़द्दस तख्त पर एक हसीन लौंडी को नचाना चाहते हो-अकबर।

➤  मान सिंह! लो हम आज मुगलों का मुस्तकबिल तुम्हारे हवाले करते हैं- अकबर।

➤  अगर खय्याम की रुबाई सुनहरे वर्क की बजाए पथरीली जमीन पर लिख दी जाए तो क्या उसके मायने बदल जाएंगे- सलीम।

...


                                                       

                                                                      






Tuesday, 28 July 2020

A tribute to Dance Queen

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सरोज खान : कोरस डांसर से मास्टरजी बनने तक का कड़ा संघर्ष


-बुशरा खान नूरी...

तीन साल की नन्हीं उम्र में जो पांव थिरकने शुरू हुए वे 68 साल तक नाचते और नचाते रहे। बॉलीवुड और शिष्यों के बीच वे मास्टरी जी पुकारी जाती हैं। जिक्र कर रही हूं मशहूर कोरियिोग्राफर और डांसर सरोज खान का।  असली नाम उनका निर्मला नागपाल साधू था। जन्म मुंबई में 22 नवंबर 1948 में आजाद भारत में हुआ था। उनका परिवार लाहौर में बसता था। दो मुल्क बने तो वहां अपना सब कुछ छोडऩा पड़ा। पैसा और जेवरात साथ लेकर वे चले आए। मगर किसी फिल्मी कहानी की तरह यहां स्टेशन पर उनका बैग किसी दूसरे के बैग से बदल गया। जो था, वह भी गया। परिवार ने मुंबई में सिर छुपाने की जगह ढूंढी। 

सरोज तीन साल की थीं। एक दिन उन्हें अपनी परछांई देखकर हाथ-पैर हिलाते देखा तो मां डर गई। बेटी पागल तो नहीं हो गई? डॉक्टर के पास ले गईं। डॉक्टर ने कहा यह कोई बीमारी नहीं, टैलेंट है। बेटी को फिल्मों में भेज देंगी तो नाम और पैसा दोनों मिलेगा। मगर हम तो फिल्मों में किसी को जानते नहीं। डॉक्टर ने कहा मेरे पास बहुत-से फिल्म वाले इलाज करवाने आते हैं, उनसे जिक्र करुंगा। 
यहां से शुरू हुआ संघर्ष उन्हें उस मुकाम तक ले पहुंचा जहां सरोज का कोई सानी नहीं था। 9  साल की उम्र तक वे फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करती रहीं। गुजारा चलता रहा। फिर उनकी  मांग घटती गई। उन्होंने जूनियर डांस ग्रुप जॉयन कर लिया। वे हीरोइन के पीछे नाचने वाले कोरस का हिस्सा हुआ करती थींं। इसी बीच पिता का भी निधन हो गया। अब फाकों की नौबत आ पड़ी थी। पड़ोस में भजिया बेचने वाला रोज बचे हुए भजिया और ब्रेड दे जाता था। गुजरा चलता रहा परिवार में उनसे छोटी तीन बहनें और एक भाई था। 
 सरोज वैस्टर्न डांस किया करती थीं। उन्होंने कहीं से डांस की औपचारिक शिक्षा भी नहीं ली थी। जल्द ही बॉलीवुड में मद्रास डांस स्टाइल की एंट्री हुई। यह काफी मुश्किल स्टाइल था। इधर जूनियर ग्रुप्स में भी इंडियन डांसर की मांग बढ़ रही थी। उस समय के मशहूर कोरियोग्राफर बी. सोहनलाल ने सरोज के असाधारण टैलेंट को परखा। उन्होंने उन्हें पांच साल तक इंडियन डांस सिखाया। 12 साल की उम्र में  सरोज सोहनलाल की असिसटेंड बन गईं । वे वैजयंती माला और कई एक्टर को डांस सिखाने लगीं। सबकी फेवरेट भी थीं। 

 साल 1963 की बात है। फिल्म 'दिल ही तो है' का एक गीत था 'निगाहें मिलाने को जी चाहता है...।' इसे कंपोज करने का एडवांस ले चुके थे उनके गुरु। मगर  उन्हें विदेश जाना पड़ा। असिसटेंट होने के नाते गाना कंपोज करने का दबाव अब सरोज पर था।  सरोज बोलीं- मैं डांस करती और सिखाती हूं, गाना कंपोज करना मुझे नहीं आता। फिल्म के निर्देशक पीएल संतोषी ने उन्हें मोटीवेट किया। तब सरोज ने आसानी से गाना कंपोज कर दिया। 
सरोज को अपनेे मास्टरजी सोहनलाल से प्यार हो गया था। वे उम्र में सरोज से 30 से बड़े थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि शायद वे उन्हें उनके डांस की वजह से प्रेम करने लगी थीं। दोनों का विवाह हो गया। चौदह साल की उम्र में सरोज मां बनीं। मगर यहां भी किस्मत उन्हें आजमा रही थी। सोहनलाल ने बच्चे को अपना नाम देने से इंकार कर दिया। वे पहले से ही शादीशुदा और चार बच्चों के पिता थे। सरोज पति को छोड़कर अपने घर आ गईं। फिर से दौर शुरू हुआ संंघर्ष का। अभिनेत्री साधना ने उन्हें फिल्म 'गीता मेरा नाम' में काम दिलवाया। इस फिल्म पहली बार बतौर कोरियोग्राफर सरोज ने काम किया। 10 साल गुजर गए थे। अपने बच्चे को पिता का नाम देने के लिए सरोज ने सरदार रोशन खान से शादी कर ली। इस पठान ने उन्हें और उनके बच्चे को अपना नाम दिया। सरोज से वे सरोज खान हो गईं।   
भेदभाव भी झेला 
सरोज दिन-रात मेहनत कर रही थीं मगर उन्हें पहचान नहीं मिल रही थी। एक महिला कोरियोग्राफर को लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। यह वह दौर था जब कोरियोग्राफर पुरुष ही हुआ करते थे। लोगों को लगता था कि यह काम महिला नहीं कर सकती। इसलिए उन्हें अच्छी फिल्में नहीं मिल रही थीं।  मगर उन्होंने पुरुषों के बीच रहकर उनके अधिकार वाले कॅरियर में संघर्ष किया और पहचान पाई। 

कामयाबी का काउनडाउन 
फिल्म 'तेजाब' ने सरोज खान और माधूरी दीक्षित को रातों-रात सुपरस्टार बना दिया।  'एक-दो-तीन... गाने ने जो हंगामा बरपाया उसे देखते हुए फिल्म फेयर ने पहली बार कोरियोग्राफर कैटेगरी अवॉर्ड के दरवाजे खोल दिए। फिल्म फेयर का पहला कोरियाग्राफी अवॉर्ड सरोज खान को दिया गया। इसके बाद उन्हें कई बार ये अवॉड मिला। यह सरोज का टर्निंग प्वाइं था। इसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। एक गाने के बीस-पच्चीस हजार लेने वाली सरोज एक लाख लेने लगीं। अब गानों पर भी फिल्में हिट होने लगीं।  उन्होंने मील का पत्थर साबित होने वाले गाने मैं तेरी दुश्मन..., तू चीज बड़ी है मस्त...ताल से ताल मिला..., निंबूड़ा-निंबूड़ा...,मधुबन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले..., मार डाला..., डोला रे-डोला रे..., ये इश्क हाय बैठे बिठाए... जैसे गाने कंपोज किए। गोविंदा, संजय दत्त, सनी देओल, आमिर खान, अजय देवगन , अक्षय कुमार सहित न जाने कितने कलाकारों को डांस सिखाया। उन्होंने लगभग 2000 फिल्में कीं।

कोरियोग्राफी में पहला नेशनल अवॉर्ड पाने वाली भी सरोज हैं। उन्होंने अवॉर्ड की हेट्रिक लगाई। पहला अवॉर्ड 1989 में,  दूसरा 1990 में फिल्म 'चालबाज' के लिए, 1991 में फिल्म 'सैलाब' के गीत' हमको आजकल है इंतजार...', 1992 में 'बेटा' के गीत 'धक-धक करने लगा...' और 1993 में फिल्म 'खलनायक' के गीत 'चोली के पीछे...' उन्हें अवॉर्ड दिया गया।  
आज सोशल मीडिया की वजह से लोग समझ पा रहे हैं कि परदे पर नाचने वाले हीरो-हीरोइन को नचाने वाला कोई कोरियोग्राफर होता है। एक जमाने तक लोगों को यह नहीं मालूम था कि मधु बाला, नूतन, श्यामा या अन्य हीरोइनों के ठुमके देखकर वे जो तालियां बजाते हैं उसकी असली हकदार परदे के पीछे है।
 71 साल की उम्र में 3 जुलाई 2020 को सरोज खान दुनियॉ से चल बसीं। श्रद्धांजलि अर्पित ।

मास्टर जी की सीख : 
डोंट गिव अप।
कदमों के निशां छोड़ो।
खुद को पहचनों।


Dil Diya Hai Jaan Bhi Denge Aye Watan Tere Liye...

  हम जिएंगे और मरेंगे ए वतन तेरे लिए... Bushra चौतीस   साल पहले ऐसे ही अगस्त के महीने का एक दिन था। गीतकार आनंद बख्शी के घर कई लोग बैठे थे।...