Wednesday, 12 August 2020

The man who give us unforgettable 'SHAHEED'

भुला दिए गए शहीद फिल्म बनाने वाले केवल कश्यप


Bushra Khan noori...

केवल  पी. कश्यप और मनोज कुमार की मुलाकात अक्सर अखबार के दफ्तर में होती रहती थी। केशव फिल्म इंडस्ट्री में पीआर का काम करते थे।  म्यूजिक कंपोजर शंकर जयकिशन, ओपी नय्यर आदि का प्रचार का काम देखा करते थे। काम अच्छा चल रहा था मगर शायद अंदर कोई बेचैनी थी। 

एक दिन वे मनोज से बोले कि मैं पब्लिसिटी के काम से थक चुका हूं,  एक फिल्म बनाना चाहता हूं। फिल्म शहीद भगत सिंह पर बनाना चाहता हूं। मनोज ने उन्हें किसी लीडिंग स्टार को फिल्म में लेने की सलाह दी। मगर केशव ने मनोज से ही इस फिल्म का जिम्मा लेने की बात कही। मनोज कुमार देशभक्ति पर फिल्मे बनाने के लिए मशहूर थे। मनोज कुमार ने उन्हें समझते हुए कहा कि इस पर पहले ही 2 फिल्में बन चुकी हैं। वे कोई खास नहीं चल पाई। मगर केशव थे कि अपने इरादे पर अडिग थे।  फिर क्या था मनोज को राज़ी होना पड़ा। यहां से शुरू हुई कहानी शहीद के बनने की।
 फिल्म  के लिए पैसा इकठ्ठा करने में बहुत मुश्किलें पेश आई  इन बातों का जिक्र मनोज कुमार अखबारों को दिए अपने इंटरव्यूज में कर चुके हैं। फिल्म में मनोज कुमार भगत सिंह के किरदार में थे। सुखदेव बने थे प्रेम चोपड़ा और  शिवराम राजगुरु का रोल अनंत कुमार मराठे  ने निभाया था 
 सन 1965 में शहीद प्रदर्शित हुई।  एस. राम शर्मा ने इस फिल्म का निर्देशन किया था। फिल्म सुपरहिट रही। 
फिल्म के बेजोड़ गाने नई पुरानी पीढ़ी के दिलों पर राज करते हैं।
-सरफरोशी की तमन्ना ... मेरा रंग दे बसंती चोला...
-पगड़ी संभाल जट्टा ... ए वतन ऐ वतन सरीखे गानों ने धूम मचा दी थी...

फिल्म बनने के 50 साल बाद केशव कश्यप की नाराज़गी भी लोगों के सामने आई। मनोज कुमार ने शहीद के 50 साल पूरे होने पर फिल्म की स्क्रीनिंग का कार्यक्रम रखा था। इसमें केशव ने आने से इंकार कर दिया।  उनके मना करने पर मनोज कुमार ने यह प्रोग्राम ही कैंसल कर दिया।
 केशव को शिकायत थी कि उन्हें इस के बारे में सिर्फ एक दिन पहले ही बताया गया था।
 साथ ही उनके मन में छुपी कोई कसक भी मानो उबल पड़ी थी। उन्हें लगता है कि फिल्म का सारा क्रेडिट मनोज कुमार ले गए। मनोज का कहना था कि वे अपने हर इंटरव्यू में फिल्म के प्रोड्यूसर का जिक्र जरूर करते हैं। खैर, अपने दिल की शिकायतें लेकर भगत सिंह बनाने वाले केशव दुनिया को अलविदा कह गए। 
रुपहले पर्दे पर दुनिया जिसे  देखती है वहीं चेहरा याद रहता है। पर्दे के पीछे के लोगों का योगदान बंद दरवाजे के पीछे ही रहता है। 

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