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-बुशरा खान नूरी...
तीन साल की नन्हीं उम्र में जो पांव थिरकने शुरू हुए वे 68 साल तक नाचते और नचाते रहे। बॉलीवुड और शिष्यों के बीच वे मास्टरी जी पुकारी जाती हैं। जिक्र कर रही हूं मशहूर कोरियिोग्राफर और डांसर सरोज खान का। असली नाम उनका निर्मला नागपाल साधू था। जन्म मुंबई में 22 नवंबर 1948 में आजाद भारत में हुआ था। उनका परिवार लाहौर में बसता था। दो मुल्क बने तो वहां अपना सब कुछ छोडऩा पड़ा। पैसा और जेवरात साथ लेकर वे चले आए। मगर किसी फिल्मी कहानी की तरह यहां स्टेशन पर उनका बैग किसी दूसरे के बैग से बदल गया। जो था, वह भी गया। परिवार ने मुंबई में सिर छुपाने की जगह ढूंढी।
सरोज तीन साल की थीं। एक दिन उन्हें अपनी परछांई देखकर हाथ-पैर हिलाते देखा तो मां डर गई। बेटी पागल तो नहीं हो गई? डॉक्टर के पास ले गईं। डॉक्टर ने कहा यह कोई बीमारी नहीं, टैलेंट है। बेटी को फिल्मों में भेज देंगी तो नाम और पैसा दोनों मिलेगा। मगर हम तो फिल्मों में किसी को जानते नहीं। डॉक्टर ने कहा मेरे पास बहुत-से फिल्म वाले इलाज करवाने आते हैं, उनसे जिक्र करुंगा।
यहां से शुरू हुआ संघर्ष उन्हें उस मुकाम तक ले पहुंचा जहां सरोज का कोई सानी नहीं था। 9 साल की उम्र तक वे फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करती रहीं। गुजारा चलता रहा। फिर उनकी मांग घटती गई। उन्होंने जूनियर डांस ग्रुप जॉयन कर लिया। वे हीरोइन के पीछे नाचने वाले कोरस का हिस्सा हुआ करती थींं। इसी बीच पिता का भी निधन हो गया। अब फाकों की नौबत आ पड़ी थी। पड़ोस में भजिया बेचने वाला रोज बचे हुए भजिया और ब्रेड दे जाता था। गुजरा चलता रहा। परिवार में उनसे छोटी तीन बहनें और एक भाई था।
सरोज वैस्टर्न डांस किया करती थीं। उन्होंने कहीं से डांस की औपचारिक शिक्षा भी नहीं ली थी। जल्द ही बॉलीवुड में मद्रास डांस स्टाइल की एंट्री हुई। यह काफी मुश्किल स्टाइल था। इधर जूनियर ग्रुप्स में भी इंडियन डांसर की मांग बढ़ रही थी। उस समय के मशहूर कोरियोग्राफर बी. सोहनलाल ने सरोज के असाधारण टैलेंट को परखा। उन्होंने उन्हें पांच साल तक इंडियन डांस सिखाया। 12 साल की उम्र में सरोज सोहनलाल की असिसटेंड बन गईं । वे वैजयंती माला और कई एक्टर को डांस सिखाने लगीं। सबकी फेवरेट भी थीं।
साल 1963 की बात है। फिल्म 'दिल ही तो है' का एक गीत था 'निगाहें मिलाने को जी चाहता है...।' इसे कंपोज करने का एडवांस ले चुके थे उनके गुरु। मगर उन्हें विदेश जाना पड़ा। असिसटेंट होने के नाते गाना कंपोज करने का दबाव अब सरोज पर था। सरोज बोलीं- मैं डांस करती और सिखाती हूं, गाना कंपोज करना मुझे नहीं आता। फिल्म के निर्देशक पीएल संतोषी ने उन्हें मोटीवेट किया। तब सरोज ने आसानी से गाना कंपोज कर दिया।
सरोज को अपनेे मास्टरजी सोहनलाल से प्यार हो गया था। वे उम्र में सरोज से 30 से बड़े थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि शायद वे उन्हें उनके डांस की वजह से प्रेम करने लगी थीं। दोनों का विवाह हो गया। चौदह साल की उम्र में सरोज मां बनीं। मगर यहां भी किस्मत उन्हें आजमा रही थी। सोहनलाल ने बच्चे को अपना नाम देने से इंकार कर दिया। वे पहले से ही शादीशुदा और चार बच्चों के पिता थे। सरोज पति को छोड़कर अपने घर आ गईं। फिर से दौर शुरू हुआ संंघर्ष का। अभिनेत्री साधना ने उन्हें फिल्म 'गीता मेरा नाम' में काम दिलवाया। इस फिल्म पहली बार बतौर कोरियोग्राफर सरोज ने काम किया। 10 साल गुजर गए थे। अपने बच्चे को पिता का नाम देने के लिए सरोज ने सरदार रोशन खान से शादी कर ली। इस पठान ने उन्हें और उनके बच्चे को अपना नाम दिया। सरोज से वे सरोज खान हो गईं।
भेदभाव भी झेला
सरोज दिन-रात मेहनत कर रही थीं मगर उन्हें पहचान नहीं मिल रही थी। एक महिला कोरियोग्राफर को लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। यह वह दौर था जब कोरियोग्राफर पुरुष ही हुआ करते थे। लोगों को लगता था कि यह काम महिला नहीं कर सकती। इसलिए उन्हें अच्छी फिल्में नहीं मिल रही थीं। मगर उन्होंने पुरुषों के बीच रहकर उनके अधिकार वाले कॅरियर में संघर्ष किया और पहचान पाई।
कामयाबी का काउनडाउन
फिल्म 'तेजाब' ने सरोज खान और माधूरी दीक्षित को रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। 'एक-दो-तीन... गाने ने जो हंगामा बरपाया उसे देखते हुए फिल्म फेयर ने पहली बार कोरियोग्राफर कैटेगरी अवॉर्ड के दरवाजे खोल दिए। फिल्म फेयर का पहला कोरियाग्राफी अवॉर्ड सरोज खान को दिया गया। इसके बाद उन्हें कई बार ये अवॉड मिला। यह सरोज का टर्निंग प्वाइं था। इसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। एक गाने के बीस-पच्चीस हजार लेने वाली सरोज एक लाख लेने लगीं। अब गानों पर भी फिल्में हिट होने लगीं। उन्होंने मील का पत्थर साबित होने वाले गाने मैं तेरी दुश्मन..., तू चीज बड़ी है मस्त...ताल से ताल मिला..., निंबूड़ा-निंबूड़ा...,मधुबन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले..., मार डाला..., डोला रे-डोला रे..., ये इश्क हाय बैठे बिठाए... जैसे गाने कंपोज किए। गोविंदा, संजय दत्त, सनी देओल, आमिर खान, अजय देवगन , अक्षय कुमार सहित न जाने कितने कलाकारों को डांस सिखाया। उन्होंने लगभग 2000 फिल्में कीं।
कोरियोग्राफी में पहला नेशनल अवॉर्ड पाने वाली भी सरोज हैं। उन्होंने अवॉर्ड की हेट्रिक लगाई। पहला अवॉर्ड 1989 में, दूसरा 1990 में फिल्म 'चालबाज' के लिए, 1991 में फिल्म 'सैलाब' के गीत' हमको आजकल है इंतजार...', 1992 में 'बेटा' के गीत 'धक-धक करने लगा...' और 1993 में फिल्म 'खलनायक' के गीत 'चोली के पीछे...' उन्हें अवॉर्ड दिया गया।
आज सोशल मीडिया की वजह से लोग समझ पा रहे हैं कि परदे पर नाचने वाले हीरो-हीरोइन को नचाने वाला कोई कोरियोग्राफर होता है। एक जमाने तक लोगों को यह नहीं मालूम था कि मधु बाला, नूतन, श्यामा या अन्य हीरोइनों के ठुमके देखकर वे जो तालियां बजाते हैं उसकी असली हकदार परदे के पीछे है।
71 साल की उम्र में 3 जुलाई 2020 को सरोज खान दुनियॉ से चल बसीं। श्रद्धांजलि अर्पित ।
मास्टर जी की सीख :
डोंट गिव अप।
कदमों के निशां छोड़ो।
खुद को पहचनों।
सरोज खान : कोरस डांसर से मास्टरजी बनने तक का कड़ा संघर्ष
-बुशरा खान नूरी...
तीन साल की नन्हीं उम्र में जो पांव थिरकने शुरू हुए वे 68 साल तक नाचते और नचाते रहे। बॉलीवुड और शिष्यों के बीच वे मास्टरी जी पुकारी जाती हैं। जिक्र कर रही हूं मशहूर कोरियिोग्राफर और डांसर सरोज खान का। असली नाम उनका निर्मला नागपाल साधू था। जन्म मुंबई में 22 नवंबर 1948 में आजाद भारत में हुआ था। उनका परिवार लाहौर में बसता था। दो मुल्क बने तो वहां अपना सब कुछ छोडऩा पड़ा। पैसा और जेवरात साथ लेकर वे चले आए। मगर किसी फिल्मी कहानी की तरह यहां स्टेशन पर उनका बैग किसी दूसरे के बैग से बदल गया। जो था, वह भी गया। परिवार ने मुंबई में सिर छुपाने की जगह ढूंढी।
सरोज तीन साल की थीं। एक दिन उन्हें अपनी परछांई देखकर हाथ-पैर हिलाते देखा तो मां डर गई। बेटी पागल तो नहीं हो गई? डॉक्टर के पास ले गईं। डॉक्टर ने कहा यह कोई बीमारी नहीं, टैलेंट है। बेटी को फिल्मों में भेज देंगी तो नाम और पैसा दोनों मिलेगा। मगर हम तो फिल्मों में किसी को जानते नहीं। डॉक्टर ने कहा मेरे पास बहुत-से फिल्म वाले इलाज करवाने आते हैं, उनसे जिक्र करुंगा।
यहां से शुरू हुआ संघर्ष उन्हें उस मुकाम तक ले पहुंचा जहां सरोज का कोई सानी नहीं था। 9 साल की उम्र तक वे फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करती रहीं। गुजारा चलता रहा। फिर उनकी मांग घटती गई। उन्होंने जूनियर डांस ग्रुप जॉयन कर लिया। वे हीरोइन के पीछे नाचने वाले कोरस का हिस्सा हुआ करती थींं। इसी बीच पिता का भी निधन हो गया। अब फाकों की नौबत आ पड़ी थी। पड़ोस में भजिया बेचने वाला रोज बचे हुए भजिया और ब्रेड दे जाता था। गुजरा चलता रहा। परिवार में उनसे छोटी तीन बहनें और एक भाई था।
सरोज वैस्टर्न डांस किया करती थीं। उन्होंने कहीं से डांस की औपचारिक शिक्षा भी नहीं ली थी। जल्द ही बॉलीवुड में मद्रास डांस स्टाइल की एंट्री हुई। यह काफी मुश्किल स्टाइल था। इधर जूनियर ग्रुप्स में भी इंडियन डांसर की मांग बढ़ रही थी। उस समय के मशहूर कोरियोग्राफर बी. सोहनलाल ने सरोज के असाधारण टैलेंट को परखा। उन्होंने उन्हें पांच साल तक इंडियन डांस सिखाया। 12 साल की उम्र में सरोज सोहनलाल की असिसटेंड बन गईं । वे वैजयंती माला और कई एक्टर को डांस सिखाने लगीं। सबकी फेवरेट भी थीं।
साल 1963 की बात है। फिल्म 'दिल ही तो है' का एक गीत था 'निगाहें मिलाने को जी चाहता है...।' इसे कंपोज करने का एडवांस ले चुके थे उनके गुरु। मगर उन्हें विदेश जाना पड़ा। असिसटेंट होने के नाते गाना कंपोज करने का दबाव अब सरोज पर था। सरोज बोलीं- मैं डांस करती और सिखाती हूं, गाना कंपोज करना मुझे नहीं आता। फिल्म के निर्देशक पीएल संतोषी ने उन्हें मोटीवेट किया। तब सरोज ने आसानी से गाना कंपोज कर दिया।
सरोज को अपनेे मास्टरजी सोहनलाल से प्यार हो गया था। वे उम्र में सरोज से 30 से बड़े थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि शायद वे उन्हें उनके डांस की वजह से प्रेम करने लगी थीं। दोनों का विवाह हो गया। चौदह साल की उम्र में सरोज मां बनीं। मगर यहां भी किस्मत उन्हें आजमा रही थी। सोहनलाल ने बच्चे को अपना नाम देने से इंकार कर दिया। वे पहले से ही शादीशुदा और चार बच्चों के पिता थे। सरोज पति को छोड़कर अपने घर आ गईं। फिर से दौर शुरू हुआ संंघर्ष का। अभिनेत्री साधना ने उन्हें फिल्म 'गीता मेरा नाम' में काम दिलवाया। इस फिल्म पहली बार बतौर कोरियोग्राफर सरोज ने काम किया। 10 साल गुजर गए थे। अपने बच्चे को पिता का नाम देने के लिए सरोज ने सरदार रोशन खान से शादी कर ली। इस पठान ने उन्हें और उनके बच्चे को अपना नाम दिया। सरोज से वे सरोज खान हो गईं।
भेदभाव भी झेला
सरोज दिन-रात मेहनत कर रही थीं मगर उन्हें पहचान नहीं मिल रही थी। एक महिला कोरियोग्राफर को लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। यह वह दौर था जब कोरियोग्राफर पुरुष ही हुआ करते थे। लोगों को लगता था कि यह काम महिला नहीं कर सकती। इसलिए उन्हें अच्छी फिल्में नहीं मिल रही थीं। मगर उन्होंने पुरुषों के बीच रहकर उनके अधिकार वाले कॅरियर में संघर्ष किया और पहचान पाई।
कामयाबी का काउनडाउन
फिल्म 'तेजाब' ने सरोज खान और माधूरी दीक्षित को रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। 'एक-दो-तीन... गाने ने जो हंगामा बरपाया उसे देखते हुए फिल्म फेयर ने पहली बार कोरियोग्राफर कैटेगरी अवॉर्ड के दरवाजे खोल दिए। फिल्म फेयर का पहला कोरियाग्राफी अवॉर्ड सरोज खान को दिया गया। इसके बाद उन्हें कई बार ये अवॉड मिला। यह सरोज का टर्निंग प्वाइं था। इसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। एक गाने के बीस-पच्चीस हजार लेने वाली सरोज एक लाख लेने लगीं। अब गानों पर भी फिल्में हिट होने लगीं। उन्होंने मील का पत्थर साबित होने वाले गाने मैं तेरी दुश्मन..., तू चीज बड़ी है मस्त...ताल से ताल मिला..., निंबूड़ा-निंबूड़ा...,मधुबन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले..., मार डाला..., डोला रे-डोला रे..., ये इश्क हाय बैठे बिठाए... जैसे गाने कंपोज किए। गोविंदा, संजय दत्त, सनी देओल, आमिर खान, अजय देवगन , अक्षय कुमार सहित न जाने कितने कलाकारों को डांस सिखाया। उन्होंने लगभग 2000 फिल्में कीं।
कोरियोग्राफी में पहला नेशनल अवॉर्ड पाने वाली भी सरोज हैं। उन्होंने अवॉर्ड की हेट्रिक लगाई। पहला अवॉर्ड 1989 में, दूसरा 1990 में फिल्म 'चालबाज' के लिए, 1991 में फिल्म 'सैलाब' के गीत' हमको आजकल है इंतजार...', 1992 में 'बेटा' के गीत 'धक-धक करने लगा...' और 1993 में फिल्म 'खलनायक' के गीत 'चोली के पीछे...' उन्हें अवॉर्ड दिया गया।
आज सोशल मीडिया की वजह से लोग समझ पा रहे हैं कि परदे पर नाचने वाले हीरो-हीरोइन को नचाने वाला कोई कोरियोग्राफर होता है। एक जमाने तक लोगों को यह नहीं मालूम था कि मधु बाला, नूतन, श्यामा या अन्य हीरोइनों के ठुमके देखकर वे जो तालियां बजाते हैं उसकी असली हकदार परदे के पीछे है।
71 साल की उम्र में 3 जुलाई 2020 को सरोज खान दुनियॉ से चल बसीं। श्रद्धांजलि अर्पित ।
मास्टर जी की सीख :
डोंट गिव अप।
कदमों के निशां छोड़ो।
खुद को पहचनों।



सुंदर रचना बुशरा जी
ReplyDeleteGood article
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है आपने
ReplyDeleteThanks
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